Judicial Review न्यायिक समीक्षा भारतीय संविधान में इसकी स्थिति

 आज हम बात करेंगे भारतीय संविधान  में दिए गए न्यायिक पुनर्विलोकन  (Judicial review) के बारे में  कि भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial review) की क्या स्थिति है और उसका योगदान क्या है। और आज तक न्यायालयों ने उसका किस तरह से उपयोग किया है। 

संविधान का अनुच्छेद 13 न्यायालय को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदान करता है।  यह शक्ति उच्चतम न्यायालय को भारतीय संविधान में दिए गए अनुच्छेद 32 तथा उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के तहत प्राप्त है।  भारत में संविधान ही सर्वोत्तम विधि है।

                न्यायिक पुनर्विलोकन  (Judicial review) 

 संसद या विधानमंडल द्वारा बनाई गई सारी विधियाँ भारतीय संविधान के अनुरूप होनी चाहिए। भारतीय न्यायालयों को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह किसी भी विधि की संवैधानिकता की जांच कर सकती हैं। यह शक्ति ही न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति कहलाती है। 
सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय इसी न्यायिक पुनर्विलोकन के तहत यह स्पष्ट कर सकते हैं कि कौन सी विधि संवैधानिक है और कौन सी असंवैधानिक। 
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अमेरिका के संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन के बारे में कोई भी स्पष्ट उपबंध नहीं किए गया है। वहां की संसद
सम्यक् विधि प्रक्रिया (Due Process of Law) नियम के तहत न्यायालय पुनर्विलोकन की शक्ति का प्रयोग करती। 
मारबरी बनाम मैडीसन (1803) के बहुत ही महत्वपूर्ण मामले में मुख्य न्यायाधीश मार्शल नेे कहा था ” निश्चित रूप से सभी लोग जिन्होंने लिखित संविधान बनाया है संविधान को राष्ट्र की आधारभूत और सर्वोपरि विधि मानते हैं और परिणाम स्वरूप ऐसी प्रत्येक सरकार का सिद्धांत यह होना चाहिए कि संविधान के विरुद्ध विधानमंडल का अधिनियम शूून्य होता है। 
ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य AIR 1950 SC  के बाद में मुख्य न्यायाधीश कानिया ने कहा कि अनुच्छेद 13 तो वास्तव में चेतावनी के लिए दिया गया है इसके ना होने पर भी न्यायालय किसी भी विधि की संवैधानिकता कि जांच कर सकती है। 
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य AIR 1973 इस महत्वपूर्ण मामले में न्यायाधीश खन्ना ने कहा कि संविधान की  
Federal method में न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) की आवश्यकता होती है Federal method में सरकार की शक्तियों का बंटवारा किया जाता है और इनकी शक्तियों में संतुलन बनाए रखना अति आवश्यक होता है न्यायिक पुनर्विलोकन हमारी संवैधानिक पद्धति का एक अटूूूूट हिस्सा है। 
भारतीय न्यायालयों की तुलना में अमेरिकी न्यायालयों को पुनर्विलोकन (Judicial Review) की शक्ति कुछ अधिक है इसके दो प्रमुख कारण हैं एक तो भारतीय संविधान बड़ा ही विस्तृत है और इसमें संशोधन की प्रक्रिया भी अमेरिकी संविधान की तुलना में बहुत ही लचीला है। 
भारत में कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमें न्यायिक पुनर्विलोकन 
(Judicial Review) की शक्ति को संकुचित बताया गया है यानी कि न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review)  की जो शक्ति है वह बहुत ही सीमित है एक बहुत ही महत्वपूर्ण मामले में जो इस प्रकार है श्रीमती इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राजनारायण ए आई आर 1975 सुप्रीम कोर्ट के मामले में मुख्यन्यायाधीश श्रीमती एम. एन. राय ने स्पष्ट किया कि संविधायी शक्ति भी शामिल है। संविधान Sovereign है, उससे न्यायालय भी बाध्य है। इसलिए यदि संविधान में संशोधन किया जाता है तो न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) की शक्ति सीमित भी हो सकती है। और आपातकाल में तो पुनर्विलोकन की शक्ति बहुत ही सीमित है जाती है। 
एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण मामले एल चंद्र कुमार बनाम भारत संघ ए आई आर 1997 सर्वोच्च न्यायालय के बाद में न्यायालय ने इस बात को दोबारा बताया कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय को दिया गया न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार संविधान का एक आधारभूत ढांचा है और उसे खत्म या समाप्त या छीना नहीं जा सकता है।  इस प्रकार इस शक्ति के अंतर्गत संविधान के पहले बनाई गई विधियां और संविधान के बाद में बनाई गई विधियाँ यदि मूल अधिकार पर अतिक्रमण करती हैं तो असंवैधानिक घोषित की जा सकती हैं। 

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