Weaknesses Of Directive Principles Of State Policy In Hindi

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राज्य के नीति निदेशक तत्व की कमजोरियां ( Weakness Of Directive Principles Of State Policy)

राज्य नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख Indian Constitution के भाग चार के अनुच्छेद 36 से 51 तक में किया गया है। संविधान के निर्माताओं ने इसका विचार सन् 1937 में बने आयरलैंड के संविधान से लिया था। 

आयरलैंड के संविधान ने इसको यूरोपीय देश स्पेन के संविधान से लिया गया था। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इन निदेशक तत्वों को विशेषता वाला बताया है। मूल अधिकारों के साथ निदेशक तत्वों को भी भारतीय संविधान की आत्मा एवं दर्शन कहा था। महान विधिशास्त्री ग्रेनविल ऑस्टिन ने  भी, ‘निदेशक तत्व और मूल अधिकारों को’ संविधान की मूल आत्मा कहा है। 

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Weakness Of Directive Principles Of State policy

Weaknesses Of Directive Principles Of State Policy In Hindi
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संविधान सभा के कुछ सदस्यों एवं अन्य संवैधानिक एवं राजनीतिक विशेषज्ञों ने राज्य की नीति के निदेशक तत्वों की निम्नलिखित आधार पर आलोचना या कमजोरियां बताई है, 

कोई कानूनी शक्ति नहीं (Non Justifiable) 

Directive Principles Of State policy की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि, यह गैर-न्यायोचित है। के.टी शाह ने इसे है ‘अतिरिक्त कर्मकांडी’ बताया और इसकी तुलना एक चेक जो बैंक में है, उसका भुगतान बैंक संसाधनों की अनुमति पर ही संभव है से की है, टी.टी कृष्णमचारी ने इनके लिए कहा है कि, “भावनाओं का स्थाई कूड़ा घर।” केसी व्हेयर ने इन्हें, “लक्ष्य एवं आकांक्षाओं का घोषणा पत्र” कहा और इन्हें धार्मिक उपदेश बताया है। 

तर्कहीन व्यवस्था (Irrational system) 

दूसरी मुख्य कम इसमें यह है कि निर्देशकों को तार्किक एवं निरंतरता के आधार पर व्यवस्थित नहीं किया गया है। एन श्रीनिवासन के अनुसार, ” इन्हें न तो उचित तरीके से वर्गीकृत किया गया है और ना ही तर्कसंगत तरीके से व्यवस्थित किया गया है। इनकी घोषणा कम महत्व के मुद्दों को अत्यावश्यक आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दों से मिलती है यह एक ही तरीके से आधुनिक एवं पुरातन को जोड़ती है। इस व्यवस्था के लिए वैज्ञानिक आधार सुझाया जाता है, जबकि यह हम भावनाओं एवं बिना पर्याप्त जानकारी के आधार पर आधारित हैं। 

रूढ़िवादी (Conservative)

यह निदेशक तत्व 19वीं सदी के इंग्लैंड के राजनीतिक दर्शन पर आधारित हैं।  संविधान के भाग 4 में यह कहा गया है कि, ” समाजवाद के बिना फेबियन समाजवाद”। उन्होंने यह कहा कि यह तत्व भारत में बीसवीं सदी के मध्य में ज्यादा उपयोगी सिद्ध होंगे इस प्रश्न का कि क्या वे 21वीं सदी में उपयोगी नहीं होंगे का जवाब नहीं दिया गया। 

संवैधानिक टकराव (Constitutional conflict)

के.संथानम का मत था कि, Directive Principles के कारण केंद्र एवं राज्यों के बीच राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के बीच और राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के बीच संविधानिक टकराव होगा।  उनके अनुसार,  केंद्र Directive principles of state policy को लागू करने के लिए राज्यों को निर्देश दे सकता है, और State policy के लागू न करने पर राज्य को बर्खास्त कर सकता है।  

इसी प्रकार जब प्रधानमंत्री को संसद द्वारा पारित कोई विधेयक प्राप्त हो तो राष्ट्रपति विधेयक को इस आधार पर अस्वीकृत कर सकता है कि यह तत्व राष्ट्र की शासन के लिए मूलभूत हैं और इसलिए मंत्रालय को इन्हें नकारने का कोई अधिकार नहीं। इसी तरह का संवैधानिक टकराव राज्य स्तर पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री ओं के बीच भी उत्पन्न हो सकता है। 

निदेशक तत्वों की कुछ प्रमुख विशेषता

 1- राज्य की नीति के निदेशक तत्व नामक इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि नीतियों एवं कानूनों को प्रभावी बनाते समय राज्य इन तत्वों को ध्यान में रखेगा। यह संवैधानिक निदेश या विधायिका, कार्यपालिका और प्रशासनिक मामलों में राज्य के लिए सिफारिशें हैं। 

अनुच्छेद 36 के अनुसार भाग 4 में ‘राज्य’ शब्द का वही अर्थ है, जो मूल अधिकारों से संबंधित भाग 3 में है। इसलिए यह केंद्र और राज्य सरकारों के विधायिका और कार्यपालिका के अंगों, सभी प्रकार के स्थानीय प्राधिकरणों और देश में सभी प्रकार के अन्य लोक प्राधिकरणों को सम्मिलित करता है। 

2- निदेशक तत्व भारत संविधान अधिनियम, 1935  मैं दिए गए अनुदेशकों के समान हैं। डॉक्टर बी आर अंबेडकर के शब्दों में निदेशक तत्व अनुदेशकों के समान हैं, जो भारत शासन अधिनियम,1935 के तहत: ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा गवर्नर जनरल और भारत की औपनिवेशिक कालोनियों के गवर्नरों को जारी किए जाते थे।

                                      जिसे निदेशक तत्व कहा जाता है, वह अनुदेशों का ही दूसरा नाम है। इसमें केवल यह अंतर है कि निदेशक तत्व विधायिका और कार्यपालिका के लिए अनुदेश हैं ना कि आदेश। 

3- आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों मैं निदेशक तत्व महत्वपूर्ण हैं। इनका उद्देश्य न्याय में उच्च आदर्श, स्वतंत्रता, समानता बनाए रखना है। जैसा कि संविधान की प्रस्तावना में दिया गया है। 

इनका उद्देश्य ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ का निर्माण करना है ना कि ‘पुलिस राज्य’ जो कि उपनिवेश काल में था। संक्षेप में आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना ही इन निदेशक तत्वों का मूल उद्देश्य है। 

नीति निदेशक एवं मूल अधिकार में अन्तर

मौलिक अधिकार

1-  यह कानूनी रूप से मान्य हैं। 

2- इनका उद्देश्य देश में लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना है। 

3- इनको लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता नहीं, यह स्वत: लागू है। 

4- यह व्यक्तिगत कल्याण को प्रोत्साहन देते हैं,  इस प्रकार यह वैयक्तिक अधिकार हैं। 

5- यह न्याय उचित होते हैं, इनके हनन पर न्यायालय द्वारा इन्हें लागू कराया जा सकता है। 

6- यह नकारात्मक है जैसा कि, यह राज्य को कुछ मामलों पर कार्य करने से प्रतिबंधित करते हैं। 

7- न्यायालय इस बात के लिए बाध्य हैं कि, किसी भी मूल अधिकार के हनन की विधि को वह गैर संवैधानिक एवं अवैध घोषित करें। 

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नीति निदेशक तत्व

1- इन्हें मौलिक एवं राजनीतिक मान्यता प्राप्त है। 

2- इनका उद्देश्य देश में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है। 

3- इन्हें लागू रखने के विधान की आवश्यकता होती है, यह स्वतः लागू नहीं होते। 

4- यह समुदाय के कल्याण को प्रोत्साहित करते हैं, इस तरह यह समाजवादी हैं। 

5- ये गैर-न्यायोचित होते हैं। इन्हें कानूनी रूप से न्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। 

6- यह सकारात्मक हैं,  राज्य को कुछ मामलों पर इनकी आवश्यकता होती है। 

7- निदेशक तत्वों का उल्लंघन करने वाली किसी विधि को न्यायालय असंवैधानिक और अवैध घोषित नहीं कर सकता। यद्यपि विधि की वैधता को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है कि इन्हें निर्देशक तत्व को प्रभावी करने के लिए लागू किया गया था। 

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नमस्कार दोस्तों मेरा नाम आकाश है मैं पिछले 5 सालों से शेयर बाजार के क्षेत्र में काम करता हूँ, और मुझे शेयर बाजार से संबंधित आर्टिकल लिखना पसंद है। मैं कोशिश करता हूँ कि आपको बेहतरीन कंटेंट दे सकूँ।

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